युद्धविराम लागू होने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी ईरान में नए सैन्य हमले किए हैं। इन हमलों में ईरानी मिसाइल ठिकानों और उन नौसैनिक जहाजों को निशाना बनाया गया जो कथित तौर पर समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रहे थे।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार यह कार्रवाई आत्मरक्षा के तहत की गई। सेना का कहना है कि उसका उद्देश्य क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों और सैन्य संसाधनों को संभावित खतरे से बचाना था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक हमले बंदर अब्बास के आसपास हुए, जो ईरान का एक महत्वपूर्ण नौसैनिक केंद्र है और रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है।
बातचीत जारी, लेकिन समझौता अभी दूर
इन हमलों के बीच ईरान ने फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने स्वीकार किया कि अमेरिका के साथ बातचीत में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन किसी अंतिम शांति समझौते की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही।
दूसरी ओर अमेरिका के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने हाल के दिनों में संकेत दिए थे कि दोनों देशों के बीच समझौते की संभावना बन रही है। इसके बावजूद नए हमलों ने स्थिति को फिर अनिश्चित बना दिया है।
भारत पर क्या होगा असर?
- भारत सीधे इस संघर्ष का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा प्रभाव कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने की आशंका है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है। यदि यहां तनाव बढ़ता है या समुद्री व्यापार प्रभावित होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।
तेल महंगा होने पर भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई भी बढ़ सकती है।
भारतीय कारोबार और प्रवासियों पर भी नजर
खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो वहां रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और रोजगार को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया के साथ भारत का व्यापार भी प्रभावित हो सकता है।
फिलहाल हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर से खुली सैन्य टकराव की ओर बढ़ता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। भारत समेत दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।





