होम Breaking News नेशनल छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश स्पोर्ट्स मनोरंजन बिजनेस अन्य

लाल किला मैदान में गूंजा जनजातीय स्वाभिमान !

By: दैनिक जाग्रत

Published On: Monday, May 25, 2026 6:57 AM

Google News
Follow Us

न्यूज डेस्क, दैनिक जागृत।।दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में रविवार का दिन सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। मांदर की थाप, लोकधुनों की गूंज और पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे हजारों लोगों के बीच जनजातीय समाज की पहचान, सम्मान और सांस्कृतिक चेतना का ऐसा दृश्य दिखाई दिया जिसने पूरे माहौल को भावनात्मक बना दिया। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष पर आयोजित राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम ने देशभर के जनजातीय समुदायों को एक मंच पर ला खड़ा किया।

इस विशाल आयोजन में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे, जबकि Vishnu Deo Sai की मौजूदगी ने कार्यक्रम को खास महत्व दिया। उनके साथ छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री केदार कश्यप और रामविचार नेताम भी उपस्थित रहे।

जनजातीय समाज को बताया भारत की सांस्कृतिक आत्मा

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने संबोधन में कहा कि जनजातीय समाज सिर्फ जंगलों और प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया पर्यावरण संकट और असंतुलित विकास जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को संतुलित और प्रकृति-सम्मत विकास का रास्ता दिखा सकता है।

उन्होंने कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए जनजातीय समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखा है। यही वजह है कि उनकी परंपराएं और जीवनशैली आज भी दुनिया के लिए सीख बन सकती हैं।

लाल किले में दिखा भारत की विविधता का रंग

लाल किला मैदान पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों, रंग-बिरंगी वेशभूषाओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से पूरी तरह जीवंत नजर आया। देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे जनजातीय कलाकारों ने लोकनृत्य और संगीत के जरिए अपनी विरासत को मंच पर उतारा। मांदर और ढोल की गूंज के बीच दर्शकों ने लंबे समय तक कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।

कार्यक्रम में दिल्ली की मुख्यमंत्री Rekha Gupta ने भी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मुलाकात की। आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों के बीच यह चर्चा भी रही कि लंबे समय बाद राजधानी में जनजातीय संस्कृति को इतने बड़े स्तर पर राष्ट्रीय मंच मिला है।

भाषा और पहचान बचाने पर सरकार का जोर

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा से जीवित रहती है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी जनजातीय भाषाओं में शुरुआती शिक्षा देने की दिशा में काम कर रही है, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी रह सके।

उन्होंने यह भी कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति और पहचान का आधार होती है। यही कारण है कि जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सरकार प्राथमिकता दे रही है।

बस्तर से सरगुजा तक संस्कृति बचाने की पहल

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण और विकास पर तेजी से काम कर रही है। उनके मुताबिक यह सिर्फ परंपराओं को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान से जोड़ने की जिम्मेदारी भी है।

उन्होंने ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए कहा कि ये कार्यक्रम जनजातीय प्रतिभा और संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का माध्यम बन रहे हैं। इससे युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना भी मजबूत हो रही है।

बिरसा मुंडा और वीर नारायण सिंह के संघर्ष की याद

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री साय ने भगवान Birsa Munda और छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह को याद करते हुए कहा कि जनजातीय समाज का योगदान स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक अतुलनीय रहा है। उन्होंने कहा कि इन महानायकों का संघर्ष नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

लाल किला मैदान में आयोजित यह समागम केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि जनजातीय समाज की एकता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का राष्ट्रीय संदेश बनकर सामने आया। यहां मौजूद हजारों लोगों के चेहरों पर अपनी पहचान और परंपराओं को लेकर जो गर्व दिखाई दिया, वही इस आयोजन की सबसे बड़ी तस्वीर बन गया।

Leave a Comment